कोरोना और आयुर्वेद: आखिर क्या है आयुर्वेदिक दृष्टिकोण इस महामारी में ? देखे पूरी खबर 

Corona and Ayurveda: What is the Ayurvedic approach in this epidemic? See full news

कोरोना और आयुर्वेद: आखिर क्या है आयुर्वेदिक दृष्टिकोण इस महामारी में ? देखे पूरी खबर 
रिपोर्ट। दीपक कोल्हे, एडिटर

कोरोना और आयुर्वेद: आखिर क्या है आयुर्वेदिक दृष्टिकोण इस महामारी में ? देखे पूरी खबर 

डेस्क रिपोर्ट। 2020 के अपेक्षा 2021 में कोरोना के सेकंड वेव ने पुरे भारत में भूचाल मचा दिया है हालाकी कोरोना की वैक्सीन को लेकर सफलता की खबरें भी लगातार सामने आ रही हैं। 

बहरहाल, कोरोना महामारी के इस पूरे समय में खासतौर पर पिछले मार्च से लेकर दिसंबर तक इस संक्रमित बीमारी से बचने और इसे शरीर से खत्म करने के लिए आयुर्वैद की चर्चा लगातार सामने आई है। आयुर्वेद ने जहां शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई है वहीं कई बार तो यह काढ़े के रूप में असरदार भी सिद्ध हुआ है। परन्तु आज के नए वेरियंट ने जो तबाही मचाई है उसमे शत प्रतिशत लोग एलोपेथी दवाओं के पीछे रात दिन से भागते नजर आ रहे है और इसका फायदा ड्रग माफियो ने भी जमकर उठाया है। 

हालाकी कोरोना व  वर्तमान में वायरस जनित कोरोना व्याधि के लगातार बढ़ते फैलाव ने जहां एक तरफ चिंता का माहौल बनाया है वहीं दूसरी तरफ भारतीय पारंपरिक जीवनशैली, स्वास्थ्य तथा औषधि प्रणालियों की महत्ता को भी उजागर किया है।

भारत सरकार द्वारा की गई सिफारिशों एवं पूर्व में प्रधानमंत्री के संदेेश से भी यह बात स्पष्ट हुई है कि इस समय आयुर्वेद को अपनाना हितकर है। आयुष मंत्रालय ने भी कोविड-19 की रोकथाम हेतु अयुर्वेदिक गाइड लाइन्स जारी की थी परन्तु इस विभाग में कार्य कर रहे डॉक्टरों ने भी लोगो को एलोपैथी पर चलने की सलाह दे डाली जबकि आयुर्वेद में कोरोना जैसी जनव्यापक बीमारियों को उनके दूषित कारकों एवं लक्षणों के आधार पर जनपदोध्वंस कहा गया है। ऐसी जनव्यापक बीमारियां वायु, जल, देश, काल के प्रदूषित होने से होती हैं तथा उत्तरोत्तर घातक होती जाती हैं।

ऐसे रोगों से बचाव हेतु आंतरिक प्रतिरोधक क्षमता को बेहतर बनाना अति आवश्यक है। आयुर्वेद में स्रोतस दुष्टि या आंतरिक अवयव में उत्पन्न दोष के अनुरूप ही व्याधि की सम्प्राप्ति (पेथोजेनेसिस) होती है और सम्प्राप्ति का विघटन ही चिकित्सा है। सरल शब्दों में कहें तो स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना ही आयुर्वेद का उद्देश्य है। आचार्यों द्वारा संहिताओं में वर्णित उपायों का सरल अर्थ लेते हुए निम्नलिखित उपाय अपनाए जा सकते हैं। आरोग्य प्राप्ति एवं संतुलित जीवन हेतु समुचित आहार (फूड), विहार (ऐक्टिविटी), आचार (हेबिट्स) एवं विचार (थॉट्स) आवश्यक हैं।

उचित आहार के अन्तर्गत सदैव गरम पानी का सेवन करें। नींबू का सेवन करें। दही, मांस, उड़द, आदि कफवर्धक पदार्थों का अति सेवन न करें। कटु एवं कसैले पदार्थों का अधिक सेवन करें। ब्लैक टी में गुड़ मिलाकर पिएं। इससे शरीर की शुद्धि होगी और साथ ही शरीर में आयरन की पूर्ति भी होगी।

नित्य रूप से 15 से 20 मिनट तक प्राणायाम करें। कुछ प्रमुख प्राणायाम जैसे कि कपालभाति, अनुलोम-विलोम, अग्निसार, उद्गीथ, बाह्य, भ्रामरी आदि को सुगमता एवं अपने स्वास्थ्य के अनुसार चुनाव कर नियमित रूप से करें। प्रतिदिन सुबह तथा शाम 2000-2500 कदम चलें। इससे पाचन संबंधी समस्याएं नहीं होंगी तथा रक्त परिसंचरण भी बेहतर होगा। उचित विचार के अंतर्गत सकारात्मक मानसिकता बनाए रखें। अन्य लोगों का भी मनोबल बढ़ाएं। किसी भी प्रकार के भ्रामक प्रचार को बढ़ावा न दें। उचित आहार-विहार और आचार-विचार का पालन लॉकडाउन खुलने के बाद भी करते रहें।

क्या कहते है  'आयुर्वेद' के जानकार इस विषय में 

कोरोना के चलते जिले के निजी और सरकारी अस्पतालों में मरीजों को जगह नहीं मिल रही, मरीज दरबदर भटकने को मजबूर हैं। मरीजों के परिजन रेमजेडेविर इंजेक्शन, फेविफ्ल्यू टेबलेट के लिए शहर की गलियों की खाख छान रहे हैं, लेकिन कोई भी अपने देश की उपचार विधा 'आयुर्वेद' पर ध्यान नहीं दे रहा है। कोरोना होते ही लोग अस्पतालों की तरफ दौड़ पड़ते हैं जबकि आयुर्वेद में इसका सफल उपचार किया जा सकता है और किया भी जा रहा है, जो कि सफल भी है। आयुर्वेद के जानकार इस पर बताते हैं कि यदि कोरोना के शुरुआत में ही पूर्ण आयुर्वेदिक पध्दति से ईलाज किया जावे तो मरीज 14 दिन में पूर्णत: स्वस्थ हो जाता है। 

देखा जावे तो एलोपैथिक में भी इतना ही समय लगता है। आयुर्वेद के जानकार बताते हैं कि इस पध्दति में इतनी प्रभावशाली औषधियां उपलब्ध हैं कि कोरोना के मरीजों को पूर्णत: स्वस्थ किया जा सकता है बस जरूरत है सहीं ईलाज की। देखा जावे तो सरकार के पास एक पूरा विभाग 'आयुष विभाग' भी कार्यरत है, लेकिन हाशिये में पड़े इस विभाग का सरकार उपयोग ही नहीं कर पा रही है। आयुष विभाग के आयुर्वेदिक डॉक्टर अपनी पध्दति को छोड़कर एलोपैथिक ईलाज में लगे हैं। जरूरत है कि सरकार आयुष डॉक्टरों को आयुर्वेदिक ईलाज करने के लिए निर्देशित करे और जानकार आयुर्वेदाचार्यो से सहयोग लें। सरकार और प्रशासन चाहे तो पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर एक जिले में प्रयोग किया जा सकता है।