गोटमार मेला 2021: पांढुर्णा में गोटमार मेले में चले पत्थरों से 358 लोग घायल

The villagers did not stop even after elaborate security arrangements and strictness. People kept raining stones from both the banks of the Jam river for nine hours.

गोटमार मेला 2021: पांढुर्णा में गोटमार मेले में चले पत्थरों से 358 लोग घायल
रिपोर्ट। एडिटर, दीपक कोल्हे

गोटमार मेला 2021: पांढुर्णा में गोटमार मेले में चले पत्थरों से 358 लोग घायल

सुरक्षा के व्यापक इंतजाम और सख्ती के बाद भी नहीं रुके ग्रामीण। नौ घंटे तक जाम नदी के दोनों तट से लोग बरसाते रहे पत्थर

पांढुर्णा (छिंदवाड़ा) साधना मध्यप्रदेशकोरोना काल में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद भी मंगलवार को मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पांढुर्णा में पारंपरिक गोटमार मेेला का आयोजन हुआ। मेले की शुरुआत सुबह नौ बजे देवी पूजा के बाद हुई और शाम 5.56 बजे झंडा हटाने के बाद मेला खत्म हुआ। पत्थरबाजी के इस खेल में सांवरगांव पक्ष ने पांढुर्णा पक्ष पर जीत हासिल की। मेला समाप्ति तक मिली जानकारी के अनुसार पथराव में दोनों पक्षों से 358 लोग घायल हुए, जिसमें से तीन गंभीर को नागपुर रेफर किया गया। वहीं एक गंभीर को छिंदवाड़ा जिला अस्पताल रेफर किया गया। एसपी विवेक अग्रवाल ने बताया कि मेले में कोई अनहोनी न हो इसके लिए छह सौ पुलिसकर्मी तैनात किए गए, मेला की वीडियोग्राफी भी करवाई गई।


गौरतलब है कि बीते कई सालों से मेले का आयोजन किया जाता रहा है। मानवाधिकर संगठनों की चेतावनी के बाद भी हर साल मेले का आयोजन होता रहा है। बीते सालों में यहां 13 लोगों की मौत भी हो चुकी है। कोरोना संक्रमण के चलते कलेक्टर सौरभ सुमन ने क्षेत्र में धारा 144 लगा रखी थी, लेकिन परंपरा के नाम पर इस साल भी गोटमार मेले का आयोजन किया गया। जिसमें खुद एसपी विवेक अग्रवाल और कलेक्टर सौरभ सुमन मौजूद रहे और दूरबीन के जरिए मेले पर नजर रखी।

हर साल होता है आयोजन

हर साल गोटमार मेला का आयोजन किया जाता है। मेले की शुरुआत पांढुर्णा की जाम नदी के किनारे हुई। जहां पलाश के लंबे पेड़ को नदी के बीच में एक झंडे के साथ खड़ा किया गया। जाम नदी के किनारे देवी पूजा के बाद दो गांव, पांढुर्णा और सावरगांव के लोगों ने एक-दूसरे पर पथराव किया। जिसके बाद बीच नदी में खड़े झंडे को हटाने की कोशिश की गई। जिसमें सावरगांव की टीम ने झंडे को वहां से हटाने में कामयाबी हासिल की।

चंडिका देवी को दिया जाता है लहू

हर साल जाटबा राजा की याद में पोला त्योहार के दूसरे दिन यह खूनी खेल खेला जाता है। हजारों की संख्या में लोग मां चंडिका देवी को लहू और पलाश के झंडे को चढ़ाकर सदियों पुरानी इस खूनी परंपरा को निभा रहे हैं। बताया जाता है कि सदियों पहले जाम नदी के किनारे जाटबा राजा का विशालकाय किला था, इस किले में आदिवासियों की ताकतवर सेनाओं का साम्राज्य था। आज भी इस किले की दीवार के अवशेष नजर आते हैं। यहां जाटबा राजा की समाधि भी मौजूद है, जो जर्जर अवस्था में पड़ी हैं, जिसकी सुध न तो नगर पालिका ने ली और न ही जनप्रतिनिधियों ने ली।